अध्यक्ष की कलम से (Chairman’s Desk..)

Mr. Dayalal Patidar
Chairman

“एक विदुषी माॅं अपनी वात्सल्यमयी कोख में ही अनन्त के पथ से अवतरित जीव को अपने दिव्य चिन्तन, दिव्य भावना एवं दिव्य आहार-विहार के द्वारा शुद्ध, सशक्त व विकासशील बनाने में तत्पर रहती है। नौ माह के गर्भावास की इस अतिमहत्वपूर्ण अवधि में सजग-सुसंस्कृत जननी शिशु चेतना को उध्र्वमुखी बना देती है।” इसी मूल चिन्तन पर विद्यानगर की स्थापना हुई है। वर्तमान के प्रदूषित परिवेश में पल्लवित हो रहे भारत के भविष्य को सद्मार्ग पर चलने का पाथेय प्रदान करना हमारा उत्तरदायित्व है। आज का विद्यार्थी माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं का बोझ लेकर सांस्कृतिक प्रदुषणयुक्त प्रकृति में श्वास लेता हुआ दिग्भ्रमित हो दोराहे पर खड़ा है। विद्यानगर परिवार ऐसी विषम परिस्थितियों में पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ विद्यार्थियो की सोच व विचार का परिमार्जन एवं परिष्करण कर उसे भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित चिन्तनधारा का ज्ञानामृत पिलाकर उसे मानवीय नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण कर उच्च मानसिक व बौद्धिक अवस्था के गन्तव्य के दुर्गम मार्ग को अतीव सरलता से पार करा सकता है। राष्ट्र की उन्नति के लिए संस्कारवान, कर्मठ तथा राष्ट्रीय मूूल्यों से ओत-प्रोत नागरिकों का निर्माण करना नितान्त आवश्यक है। विकसित होते बालक के मस्तिष्क में आस-पास के परिवेश का दीर्घकालिक प्रभाव होता है, क्रियाकलाप का अध्यंकन होता है। अतः विद्यानगर परिवार विधार्थियो को प्राकृतिक हरीतिमायुक्त गुरुकुल वातावरण में विद्यार्थियो के मन में संस्कारों का सम्पोषण करते हुए आधुनिक युगानुरुप शिक्षा एवं दीक्षा देने का गुरुत्तर दायित्व निर्वहन करने को तत्पर है। आवश्यकता है इस भगीरथ प्रयास में लगे विद्यानगर के आचार्यो पर विश्वास करने की। आपके बालक को यांत्रिक जीवन से इतर घर, परिवार, सामाजिक परिवेश, वैभवशाली इतिहास, वैज्ञानिक अवधारणा व हमारी सांस्कृतिक विरासत का दिग्दर्शन कराकर आपसी सामंजस्य की भाव सरिता प्रवाहित कर एक ऐसा सुन्दर वृक्ष बनाने को कृतसंकल्पित है जो न सिर्फ समुचित फल प्रदान करेगा बल्कि अपने पुष्पों की सुरभि से आपका घर-आंगन महकायेगा और राष्ट्ररुपी बगिया को भी सुवासित करेगा।

धन्यवाद ।